Friday, July 19, 2024
HomeHimachal Newsअहसास अब हुआ तो बहुत शर्मसार हूँ अब मानना पडेगा कि...

अहसास अब हुआ तो बहुत शर्मसार हूँ अब मानना पडेगा कि कुसूरवार हूँ। कवि रमन रघुबंशी

प्रकृति को छोड प्रगती को चुना।

              चुकाना पडा है मोल अब कई गुना

दरख्त काट डाले पहाडोँ को खोद डाला

सतलुज के रुख को चाहा तो मैंने मोड डाला 

         

  ताउम्र रहे जग मेँ जलवा जवान मेरा

सबसे ऊंचा चाहिए मुझको मकान मेरा

न गांव मेँ क्या करेंगे लोग क्या कहेंगे

लाडले मेरे बस शहर मेँ ही रहेंगे……।

शहरी हूँ मैँ पढा लिखा ना कोई गवार हूँ

अब मानना पडेगा कि कुसूरवार हूँ।

गाडियाँ भी चाहिए सुकून चैन चाहिए

मुझको विकास चाहिए फोर लेन चाहिए

नाम पैसा साथ मेँ रिस्पेक्ट चाहिए

हर हाल मेँ पावर प्रोजेक्ट चाहिए

फसलोँ मेँ खाद डालकर ही पैदावार होगी

होती रहे जो होगी गर हाहाकार होगी

चित्कारोँ और चीखो का जिम्मेवार मेँ हूँ

इन आपदा की मौतोँ का जिम्मेदार मैँ हूँ

लालची और स्वार्थी मैँ बेशुमार हूँ

अब मानना पडेगा कि कुसूरवार हूँ।

अडिग था हिमालय मैंने हिला दिया

अह्सानोँ का मैंने ऐसा सिला दिया

सीमेंट बनाना है कमाने है करोडोँ

मरते हैँ जो मरेँ कोई, जाने दो छोडो

मैं पढा लिखा हूँ मेरी सोच है हटकर

और बेचो आओ सारे चूने का पत्थर

प्यास बुझा लूंगा मैँ मशीन ग़ाडकर

पानी निकालुंगा मैँ जमीन फाडकर

अहसास अब हुआ तो बहुत शर्मसार हूँ

अब मानना पडेगा कि कुसूरवार हूँ।

सब भूल जाउंगा मैँ कुछ वक्त की ही बात है

ताउम्र झेलें दर्द वो ये दर्द जिनके साथ है

तकलीफ इतनी सी बस हम जरूर लेंगे

इक दूसरे को कुछ दिन हम कुसूर देंगे

जनता भी मैँ यहाँ की और मैँ सरकार हूँ

अब मानना पडेगा कि कुसूरवार हूँ।

अब मानना पडेगा कि कुसूरवार हूँ॥।

कवि रमन रघुबंशी की कलम से

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments