Friday, July 19, 2024
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जरूर पढ़ें पहाड़ों में दैविक शांत का महत्व

वैसे तो समूचा हिमाचल देव भूमि के नाम से जाना जाता है लेकिन हमारे सिरमोर के ऊपरी भाग में ये हर साल अथवा तीसरे वर्ष ये शांत यानी दैविक महायज्ञ मनाई जाती है।शांत का मुख्य उद्देश्य सम्पूर्ण गांव के भलाई,बरकत,स्वछता,भाई चारा बना रहने, तथा टोना टोटका रोकने एवं बुरी आत्माओं का वास न होने देने। फसल बाड़ी धन,संपदा बढ़ाने,क्लेश मिटाने के उद्देश्य से दैविक विधि द्वारा मनाई जाती है इसके लिये बाकायदा महूर्त निकलवा कर 3 दिन अथवा एक दिन जो मूहर्त के अनुसार सही हो उस हिसाब से मनाई जाती है ।पण्डितों के मन्त्रो उचारण से पूरे गांव के चारों और (सुतरेडी) यानी सूत्र रक्षक एक धागा बांधा जाता है जिसकी रखवाली पूरे गांव के लोग सामूहिक रूप से आगनयेअस्त्र तथा हथियार द्वारा जैसे तलवार, डांगरू, भाला इत्यादि से रखवाली की जाती है।7 भेली,7 छेली यानी बलियों का प्रावधान भी किया जाता है वो 14 लोग इन छेली यानी बकरी,भेली यानी गुड़ की भेली को पीठ पर उठा कर एक सुरक्षा के घेरे में पूरे गांव का चक्कर काट कर देव स्थान तक भागम – भाग लगा कर आते है साथ मे अगर उनका कोई दोस्त इस दौड़ में पिछड़ जाए तो उसकी पिटाई बिछु बूटी से की जाती है ये फेरी मन्दिर पहुंचते ही देवता जी को स्वीकार्य होती है।इस दौड़ को (ओठोर) सुरक्षा दौड़ कहा जाता है।इस शांत में बजने वाले साज दुमानु ,ढोल,नग्यारा,करनाल से (फूलणीया) रोंगटे खड़ा करने वाले ताल का जोशीला बाज़ा बजाया जाता है ।तथा “लिम्बर” लगता है उसके बारे में एक उदाहरण ये भी की देवों के देव महादेव की पावन धरती चुडधार के समीप चुरू का पेड़ा नामक एक विशाल चट्टान आती है।कहा जाता है की एक बार एक दानव रूपी विशाल अजगर ने शिरगुल महाराज के गण चुरू को परिवार सहित इस विशाल शीला पर घेर लिया था तब संकट में चुरू गण ने शिरगुल देव को पुकारा और गुहार लगाई की महाराज मुझे इस अजगर रूपी दानव से बचा लो।श्री श्री शिरगुल महाराज ने अपनी दैविक शक्ति से उस अजगर रूपी दानव पर लोहे के ओले बरसा दिए। वो अजगर इस शीला का एक बड़ा भाग काटते हुए तराहाँ नामक खाले से गुजरता हुआ भाग निकला। आज भी जब दैविक शांत होती है तो शिरगुल महाराज और चुरू का (लिम्बर)* लगा कर उसे जागृत किया जाता है तो कुछ इस प्रकार की पंक्तियाँ बोली जाती है पेश है उसके कुछ संशिप्त अंश:- ओ लिमिरा,ओ ओ ला, ला शिरगुला ओ ओ ला, ला चूड़ तेरी,ओ ओ ला, घेरी पाये,ओ ओ ला, ला चूड़ घेरी ओ ओ ला, दानों ऐ ओ ओ ला,ला चुरू घेरा ओ ओ ला, कुडबा घेरा ओ ओ ला, शोरु पाड़ी ओ ओ ला आदि आदि। :- टीका लिम्बर*एक प्रकार की जोश भरी आवाज/ललकार जिसे सुन कर देव गण प्रसन्न होकर खेल उठते हैं।प्रस्तुति:-रविन्द्र नेगी।

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