Saturday, July 20, 2024
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यहां दो लोटे जल से पूरी होती है हर मुराद, अद्भुत ‘शिरगुल महराज’

प्रकृति की गोद में बसे हिमाचल प्रदेश में तमाम तीर्थस्‍थल हैं। जिनके दर्शनों के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु पहुंचते हैं।

इन्‍हीं में से एक बेहद खास तीर्थ स्‍थान है सिरमौर जिले में। यहां दर्शन के लिए देश ही नहीं विदेश से भी श्रद्धालु आते हैं। इस स्‍थान की अपनी अलग ही महत्‍ता है। आइए जानते हैं कौन सा है यह स्‍थान और क्‍या है इसकी महत्‍ता…

हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में सबसे ऊंची चोटी चूड़धार को ही शिरगुल महराज के नाम से जाना जाता है। चोटी पर ‘शिरगुल महराज’ मंदिर की भी स्‍थापना की गई है। इन्‍हें सिरमौर और चौपाल का देवता माना जाता है। यह मंदिर प्राचीन शैली में बना है, जिससे इसके स्‍थापना काल का पता चलता है। यहां वर्ष भर सैलानियों का तांता लगा रहता है।

इस देवस्‍थान को ट्रैकिंग के लिए भी जाना जाता है।शिरगुल महराज मंदिर को लेकर पौराणिक कथाओं में शिव भक्‍त चूरु और उनके बेटे का जिक्र मिलता है। कथा के अनुसार चूरु अपने पुत्र के साथ इस मंदिर में दर्शन के लिए आया था । उसी समय अचानक एक बड़ा सा सांप न जानें कहां से आ गया। देखते ही देखते वह सांप चुरु और उसके बेटे को काटने के लिए आगे बढ़ने लगा। तभी दोनों ने भगवान शिव से अपने प्राणों की रक्षा करने की प्रार्थना की। कुछ ही क्षणों में एक विशालकाय पत्थर उस सांप के ऊपर जा गिरा।

कहते हैं कि चूरु और उसके बेटे की जान बचने के बाद दोनों ही भगवान शिव के अनन्‍य भक्‍त हुए। इस घटना के बाद से मंदिर के प्रति लोगों की श्रद्धा बढ़ती गई। साथ ही उस जगह का नाम भी चूड़धार के नाम से प्रसिद्ध हो गया। इसके अलावा चट्टान का नाम चूरु रख दिया गया। कहा जाता है कि हिमाचल प्रवास के दौरान आदि शंकराचार्य ने इस स्‍थान पर शिवलिंग की स्‍थापना की थी। इसी स्‍थान पर एक चट्टान भी मिलती है। जिसे लेकर मान्‍यता है कि यहां पर भगवान शिव अपने परिवार के साथ रहते थे। मंदिर के पास ही दो बावड़ियां हैं।

मंदिर जाने वाले सभी श्रद्धालु पहले बावड़ी में स्‍नान करते हैं। उसके बाद मंदिर में प्रवेश करते हैं।मान्‍यता है कि मंदिर के बाहर बनीं दोनों बावड़‍ियों का जल अत्‍यंत पवित्र है। कहा जाता है कि इनमें से किसी भी बावड़ी से दो लोटा जल लेकर सिर पर डालने से सभी मन्‍नतें पूरी हो जाती हैं।

चूड़धार की इस बावड़ी में भक्‍त ही नहीं बल्कि देवी-देवता भी आस्‍था की डुबकी लगाते हैं। इस क्षेत्र में जब भी किसी नए मंदिर की स्‍थापना होती है तब देवी-देवताओं की प्रतिमा को इस बावड़ी में स्‍नान कराया जाता है। इसके बाद ही उनकी स्‍थापना की जाती है। चूड़धार की बावड़ी में किये गए स्‍नान को गंगाजल की ही तरह पवित्र मानते हैं।शिरगुल महराज मंदिर में दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं की सारी मन्‍नतें तो पूरी होती ही हैं। साथ ही अगर वह किसी उलझन या परेशानी में होते हैं तो उन्‍हें उसका भी समाधान आसानी से मिल जाता है।

बता दें कि यह समाधान उन्‍हें मंदिर के पुजारी देते हैं। कहा जाता है कि वह सभी की बातें सुनने के बाद शिरगुल महराज को साक्षी मानकर समाधान बताते हैं।कथा मिलती है कि चूड़धार पर्वत के साथ पास ही हनुमान जी को संजीवनी बूटी मिली थी। सर्दियों और बरसात के मौसम में यहां भारी बर्फबारी होती है। बता दें कि यह चोटी वर्ष के ज्यादातर समय बर्फ से ही ढकी रहती है।

चूड़धार जाने के लिए गर्मियों का मौसम सबसे मुफीद माना गया है। इस पर्वत पर पहुंचने के लिए मुख्‍य रास्‍ता नौराधार से होकर गुजरता है।

यहां से चूड़धार की दूरी तकरीबन 14 किलोमीटर है। दूसरा रास्‍ता सराहन चौपाल का है। यहां से चूड़धार महज 6 किलोमीटर की ही दूरी पर हे

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